रमज़ान और रोज़े का असली उद्देश्य: दिल और आत्मा की पवित्रता

(सलीम रज़ा,पत्रकार)
रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है, जिसे रहमत, बरकत और मग़फिरत का महीना कहा जाता है। यह महीना आत्मशुद्धि, संयम, सब्र और अल्लाह की इबादत में खुद को पूरी तरह समर्पित करने का अवसर देता है। इस महीने में मुसलमान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक रोज़ा रखते हैं, जिसमें वे खाने-पीने और अन्य सांसारिक इच्छाओं से दूर रहते हैं। रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह इंसान के दिल, दिमाग और आत्मा को पवित्र करने का एक माध्यम है। यह इंसान को बुराइयों से दूर रहने और अच्छाइयों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
रमज़ान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसी महीने में अल्लाह ने अपने अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद पर अपनी पवित्र किताब कुरआन शरीफ को नाज़िल किया। कुरआन इंसानियत के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है और रमज़ान का महीना उसी मार्गदर्शन को समझने और उस पर अमल करने का अवसर प्रदान करता है। इस महीने में कुरआन की तिलावत का विशेष महत्व होता है और मुसलमान अधिक से अधिक समय अल्लाह की इबादत, नमाज़, दुआ और तौबा में बिताते हैं। रातों में विशेष नमाज़ तरावीह पढ़ी जाती है, जिसमें कुरआन का पाठ किया जाता है।
रोज़ा इंसान को सब्र, सहनशीलता और आत्मनियंत्रण सिखाता है। जब एक व्यक्ति पूरे दिन भूखा और प्यासा रहता है, तो उसे गरीबों और जरूरतमंदों की पीड़ा का एहसास होता है। इससे उसके दिल में करुणा, दया और मदद की भावना उत्पन्न होती है। यही कारण है कि रमज़ान में ज़कात और सदका देने का विशेष महत्व है। लोग अपनी कमाई का एक हिस्सा गरीबों में बांटते हैं ताकि समाज में समानता और भाईचारे की भावना बनी रहे। रोज़ा इंसान के अंदर विनम्रता पैदा करता है और उसे यह एहसास दिलाता है कि हर नेमत अल्लाह की देन है।
रमज़ान की रातों में एक खास रात होती है जिसे शबे-क़द्र कहा जाता है, जिसे हजार महीनों से बेहतर बताया गया है। इस रात में की गई इबादत का सवाब बहुत अधिक होता है। मुसलमान इस रात को जागकर नमाज़ पढ़ते हैं, कुरआन की तिलावत करते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। यह रात इंसान को एक नई शुरुआत करने और अपने जीवन को सुधारने का अवसर देती है।
रमज़ान का महीना केवल इबादत का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक सुधार का भी महीना है। इस महीने में झूठ बोलना, बुराई करना, गाली देना और किसी को कष्ट देना सख्ती से मना किया गया है। रोज़ेदार को अपने व्यवहार, शब्दों और विचारों को पवित्र रखना चाहिए। यही रोज़े की असली भावना है। अगर कोई व्यक्ति केवल भूखा-प्यासा रहे, लेकिन उसके कर्म और व्यवहार में सुधार न हो, तो रोज़े का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
रमज़ान का संबंध इस्लाम के पवित्र शहरों मक्का और मदीना से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। विशेष रूप से मस्जिद अल‑हरम में इस महीने इबादत करने का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। दुनिया भर के मुसलमान इस महीने में अपने दिलों को अल्लाह के करीब लाने की कोशिश करते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प लेते हैं।
रोज़ा इंसान के अंदर आत्मिक शक्ति को मजबूत करता है। यह उसे सिखाता है कि असली ताकत इच्छाओं को नियंत्रित करने में है। रमज़ान इंसान को यह संदेश देता है कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना है। यह महीना इंसान को अपने पिछले गुनाहों से तौबा करने, दूसरों को माफ करने और एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है।
इस प्रकार रमज़ान का महीना रहमत, बरकत, आत्मशुद्धि और इंसानियत की सेवा का महीना है। रोज़ा केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और चरित्र निर्माण का एक महान माध्यम है। यह इंसान को सब्र, त्याग, दया और अल्लाह के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाता है और उसे एक बेहतर और नेक इंसान बनने की दिशा में आगे बढ़ाता है।