डिजिटल दौर में भ्रामक खबरों का जाल और समाज पर उसका असर

(सलीम रज़ा, पत्रकार)
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया सूचना का सबसे तेज़ और प्रभावशाली माध्यम बन चुका है। जिस गति से यहां जानकारी फैलती है, उसी गति से भ्रामक खबरें भी लोगों तक पहुंच रही हैं। पहले जहां लोग अखबार, रेडियो और टीवी जैसे पारंपरिक माध्यमों पर निर्भर रहते थे, वहीं अब व्हाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म सूचना के मुख्य स्रोत बन गए हैं। यह बदलाव जितना सुविधाजनक है, उतना ही खतरनाक भी है, क्योंकि यहां पर सही और गलत जानकारी के बीच अंतर करना आम व्यक्ति के लिए कठिन होता जा रहा है।
भ्रामक खबरें केवल गलत जानकारी नहीं होतीं, बल्कि ये समाज की सोच, भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित करने की शक्ति रखती हैं। कई बार झूठी खबरें जानबूझकर इस उद्देश्य से बनाई जाती हैं कि समाज में डर, गुस्सा या नफरत पैदा हो। उदाहरण के लिए, किसी समुदाय विशेष के खिलाफ झूठी घटनाओं की कहानियां फैलाकर लोगों को भड़काया जाता है। इससे सामाजिक तनाव बढ़ता है और कई बार यह हिंसा तक पहुंच जाता है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकती है, क्योंकि लोकतंत्र सही जानकारी और जागरूक नागरिकों पर आधारित होता है।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां जानकारी साझा करने के लिए किसी प्रकार की औपचारिक सत्यापन प्रक्रिया नहीं होती। कोई भी व्यक्ति बिना किसी प्रमाण के कोई भी खबर लिखकर या वीडियो बनाकर हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। जब लोग उस खबर को बिना जांचे-परखे आगे बढ़ा देते हैं, तो वह झूठ कुछ ही घंटों में “सच” जैसा प्रतीत होने लगता है। मनोवैज्ञानिक रूप से भी लोग वही जानकारी ज्यादा स्वीकार करते हैं जो उनकी पहले से बनी हुई सोच से मेल खाती हो। इस प्रवृत्ति को “कन्फर्मेशन बायस” कहा जाता है, और यह भ्रामक खबरों के प्रसार को और तेज कर देता है।
भ्रामक खबरों का प्रभाव केवल सामाजिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर राजनीति, चुनाव और सरकारी नीतियों पर भी पड़ता है। चुनाव के समय झूठी खबरें फैलाकर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। कई बार फर्जी वीडियो और एडिटेड क्लिप्स के माध्यम से नेताओं की छवि खराब करने का प्रयास होता है। इस संदर्भ में Election Commission of India ने कई बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निर्देश दिए हैं कि वे चुनाव के दौरान गलत जानकारी पर सख्ती से नियंत्रण रखें। इसके बावजूद, तकनीकी और व्यावहारिक सीमाओं के कारण यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।
इस समस्या का एक और गंभीर पहलू यह है कि भ्रामक खबरें लोगों के बीच अविश्वास पैदा करती हैं। जब लोग बार-बार झूठी खबरों का सामना करते हैं, तो वे सही और विश्वसनीय स्रोतों पर भी संदेह करने लगते हैं। इससे मीडिया की विश्वसनीयता कमजोर होती है और समाज में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए भी चुनौती बन जाता है, क्योंकि लोगों का विश्वास किसी भी व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत होता है।
भारत में भी कई बार सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के कारण गंभीर घटनाएं हो चुकी हैं। कुछ मामलों में झूठी खबरों के कारण भीड़ ने निर्दोष लोगों पर हमला किया। इन घटनाओं ने यह साबित किया कि डिजिटल अफवाहें वास्तविक जीवन में कितना खतरनाक रूप ले सकती हैं। इस स्थिति को देखते हुए Supreme Court of India ने भी सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश दिए हैं कि वे फेक न्यूज पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाएं।
सरकार ने भी इस समस्या से निपटने के लिए कई पहल की हैं। Press Information Bureau द्वारा फैक्ट-चेक यूनिट स्थापित की गई है, जो सोशल मीडिया पर वायरल खबरों की सच्चाई की जांच करती है और लोगों को सही जानकारी प्रदान करती है। इसके अलावा, कई स्वतंत्र फैक्ट-चेकिंग संस्थाएं भी सक्रिय हैं, जो वायरल कंटेंट का विश्लेषण करके उसकी सत्यता को उजागर करती हैं। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद, भ्रामक खबरों का प्रसार पूरी तरह नहीं रुक पाया है।
इस समस्या का एक महत्वपूर्ण कारण डिजिटल साक्षरता की कमी भी है। बहुत से लोग यह नहीं जानते कि किसी खबर की सत्यता की जांच कैसे करें। वे केवल भावनात्मक रूप से प्रभावित होकर खबर को आगे बढ़ा देते हैं। इसलिए डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना बेहद आवश्यक है। लोगों को यह सिखाया जाना चाहिए कि किसी भी खबर को साझा करने से पहले उसके स्रोत की जांच करें, आधिकारिक वेबसाइट या विश्वसनीय मीडिया से पुष्टि करें, और संदिग्ध जानकारी को आगे न बढ़ाएं।
सोशल मीडिया कंपनियों की भी इस मामले में बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें ऐसे एल्गोरिदम विकसित करने चाहिए जो भ्रामक खबरों की पहचान कर सकें और उन्हें फैलने से रोक सकें। साथ ही, फर्जी अकाउंट और बॉट्स पर सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए। हालांकि, यह भी जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियंत्रण के बीच संतुलन बना रहे, ताकि सही जानकारी और वैध विचारों को दबाया न जाए।
समाज के हर वर्ग—सरकार, मीडिया, सोशल मीडिया कंपनियों और आम नागरिकों—को इस समस्या से निपटने के लिए मिलकर काम करना होगा। केवल कानून और तकनीक से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है, बल्कि लोगों की जागरूकता और जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब तक लोग खुद सच और झूठ के बीच अंतर करना नहीं सीखेंगे, तब तक भ्रामक खबरों का खतरा बना रहेगा।
अंततः, सोशल मीडिया एक शक्तिशाली उपकरण है, जो समाज को जोड़ सकता है, जागरूक कर सकता है और सकारात्मक बदलाव ला सकता है। लेकिन यदि इसका दुरुपयोग होता है, तो यह समाज को बांट भी सकता है और अस्थिरता पैदा कर सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि हम सभी सोशल मीडिया का जिम्मेदारी से उपयोग करें, केवल सत्यापित जानकारी पर विश्वास करें और अफवाहों से दूर रहें। यही जागरूकता और जिम्मेदारी समाज में शांति, विश्वास और स्वस्थ संवाद को बनाए रखने का सबसे प्रभावी उपाय है।