Wed. Feb 18th, 2026

सत्यापन के आंकड़े बढ़े, लेकिन जमीन पर कानून का डर क्यों घटा?

(सलीम रज़ा, पत्रकार)

पुलिस सत्यापन, जो मूल रूप से अपराध रोकने का एक महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है, अब एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गया है। किरायेदारों का सत्यापन, कर्मचारियों का सत्यापन, होटल और हॉस्टल का सत्यापन—यह सब कागजों में तो होता है, लेकिन जमीन पर इसका प्रभाव सीमित दिखाई देता है। सवाल यह उठता है कि यदि सत्यापन इतना प्रभावी है, तो अपराध क्यों बढ़ रहे हैं? क्या सत्यापन केवल एक आंकड़ा है, जिसे दिखाकर यह कहा जा सके कि पुलिस सक्रिय है, या यह वास्तव में अपराध रोकने का एक प्रभावी हथियार है?

हाल ही में जिस तरह सार्वजनिक स्थानों पर खुलेआम अपराध हुए, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अपराधियों के मन में कानून का डर कितना बचा है। जब अपराधी भीड़भाड़ वाले स्थानों पर वारदात करने से नहीं डरते, तो यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं होती, बल्कि यह कानून व्यवस्था की साख पर भी हमला होता है। यह संदेश जाता है कि अपराधी न केवल सक्रिय हैं, बल्कि आत्मविश्वास से भी भरे हुए हैं।

हर बड़ी घटना के बाद अधिकारियों का ट्रांसफर एक आम प्रतिक्रिया बन गई है। ट्रांसफर को एक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जैसे समस्या व्यक्ति में थी, सिस्टम में नहीं। लेकिन क्या केवल अधिकारियों को बदल देने से अपराध रुक जाएंगे? यदि अपराध का कारण सिस्टम की कमजोरी है, तो व्यक्ति बदलने से क्या फर्क पड़ेगा? यह वैसा ही है जैसे एक पुरानी मशीन में नया ऑपरेटर बैठा दिया जाए, लेकिन मशीन की खराबी को ठीक न किया जाए।

उत्तराखंड पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब केवल अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि अपराध होने से पहले उसे रोकना है। लेकिन इसके लिए केवल सत्यापन और ट्रांसफर पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत करना होगा, स्थानीय स्तर पर निगरानी बढ़ानी होगी, और सबसे महत्वपूर्ण—अपराधियों के मन में कानून का वास्तविक डर पैदा करना होगा।

समस्या का एक बड़ा कारण शहर का तेजी से बदलता स्वरूप भी है। जिस शहर की पहचान कभी शिक्षा और शांति से होती थी, वह अब तेजी से शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के दबाव में बदल रहा है। बाहरी लोगों का आना, नशे का बढ़ता कारोबार, बेरोजगारी और सामाजिक असंतुलन—ये सभी अपराध के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर रहे हैं। लेकिन इन कारणों को स्वीकार करने और इनके समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने के बजाय, प्रशासन अक्सर केवल तात्कालिक उपायों पर ध्यान देता है।

राजनीतिक नेतृत्व भी हर घटना के बाद सख्ती के निर्देश देता है। पुष्कर सिंह धामी और अन्य अधिकारी कानून व्यवस्था को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये निर्देश केवल घटनाओं के बाद दिए जाने वाले औपचारिक बयान हैं, या इनके पीछे कोई दीर्घकालिक रणनीति भी है? यदि रणनीति है, तो उसका प्रभाव जमीन पर क्यों नहीं दिखाई देता?

अपराध नियंत्रण केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी है। इसमें प्रशासन, राजनीतिक नेतृत्व, न्याय व्यवस्था और समाज सभी की भूमिका होती है। लेकिन जब सिस्टम का हर हिस्सा अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है, तो अपराधियों के लिए रास्ता आसान हो जाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि आम जनता का विश्वास धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। जब लोग देखते हैं कि अपराध हो रहे हैं और उसके बाद केवल औपचारिक कार्रवाई हो रही है, तो उनके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वे वास्तव में सुरक्षित हैं। सुरक्षा केवल अपराधियों को पकड़ने से नहीं आती, बल्कि अपराध को रोकने से आती है।

आज जरूरत केवल पुलिस सत्यापन बढ़ाने या अधिकारियों का ट्रांसफर करने की नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम को आत्ममंथन करने की है। यह समझने की जरूरत है कि अपराध क्यों बढ़ रहे हैं और उन्हें रोकने के लिए क्या वास्तविक कदम उठाए जाने चाहिए। जब तक अपराध नियंत्रण को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाएगा, तब तक इसका समाधान संभव नहीं है।

देहरादून के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कितने सत्यापन हुए या कितने अधिकारियों का ट्रांसफर हुआ, बल्कि यह है कि क्या शहर फिर से सुरक्षित और शांत बन पाएगा। इसका जवाब केवल पुलिस या प्रशासन के पास नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम के पास है। यदि सिस्टम ने समय रहते अपनी कार्यशैली नहीं बदली, तो ट्रांसफर होते रहेंगे, सत्यापन होते रहेंगे, और अपराध भी होते रहेंगे—बस बदलेंगे तो केवल नाम, पद और स्थान, लेकिन हालात वही रहेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *