दिव्यांग अधिकार अधिनियम लागू न होने से संगठनों में नाराज़गी
देहरादून : उत्तराखण्ड में दिव्यांगजनों से जुड़े मुद्दे एक बार फिर गंभीर रूप से सामने आए हैं, जहां राज्य गठन के 23 वर्ष बाद भी उनके लिए कोई समग्र और ठोस नीति न बनाए जाने को लेकर व्यापक असंतोष व्यक्त किया जा रहा है। विभिन्न दिव्यांग संगठनों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इतने लंबे समय के बाद भी इस वर्ग की आवश्यकताओं को व्यवस्थित रूप से संबोधित नहीं किया गया, जिससे दिव्यांगजन खुद को उपेक्षित और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। संगठनों का कहना है कि यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाती है।
दिव्यांग अधिकारों को लेकर केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों के बावजूद राज्य स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन का अभाव भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। संगठनों का आरोप है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 को उत्तराखण्ड में पूरी तरह लागू नहीं किया जा रहा है, और जो नियम बनाए गए हैं, उनका भी सही तरीके से पालन नहीं हो रहा। इससे दिव्यांगजनों को मिलने वाली सुविधाएं और अधिकार केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा।
प्रदेश में लगभग ढाई लाख दिव्यांगजन निवास करते हैं, जो एक बड़ा सामाजिक वर्ग है। इसके बावजूद इस वर्ग के लिए कोई स्पष्ट नीति या दीर्घकालिक योजना न होना सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। संगठनों का कहना है कि यदि इतनी बड़ी संख्या में मौजूद नागरिकों के लिए कोई ठोस दिशा-निर्देश नहीं बनाए जाते, तो यह न केवल उनके अधिकारों का हनन है बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के भी विपरीत है।
दिव्यांग संगठनों ने अपनी सात प्रमुख मांगों को सरकार के सामने रखा है, जिनमें सबसे प्रमुख मांग दिव्यांग पेंशन में वृद्धि की है। वर्तमान पेंशन राशि को अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाकर 5000 रुपये प्रतिमाह करने की मांग की गई है, ताकि दिव्यांगजन सम्मानजनक जीवन जी सकें। इसके अलावा राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा तक आरक्षण की मांग भी की गई है, जिससे नीति निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
संगठनों ने यह भी मांग उठाई है कि उत्तराखण्ड में दिव्यांग कल्याण के लिए एक अलग विभाग का गठन किया जाए, जैसा कि अन्य राज्यों में किया गया है। उनका मानना है कि एक पृथक विभाग बनने से योजनाओं का बेहतर संचालन और निगरानी संभव होगी। साथ ही, पूर्व में गठित दिव्यांग परामर्शदात्री समिति को पुनः सक्रिय करने और उसमें दिव्यांगजनों को उचित प्रतिनिधित्व देने की भी मांग की गई है, ताकि उनकी समस्याओं को सीधे सरकार तक पहुंचाया जा सके।
आर्थिक सशक्तिकरण को ध्यान में रखते हुए नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों में स्वरोजगार के अवसरों में आरक्षण देने की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई गई है। संगठनों का कहना है कि यदि दिव्यांगजनों को दुकानों और अन्य व्यवसायिक संसाधनों में प्राथमिकता दी जाए, तो वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं और समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जी सकते हैं। इसके साथ ही परिवहन सुविधाओं को सुलभ बनाने के लिए उत्तराखण्ड परिवहन विभाग की बसों में लगाए जाने वाले टैक्स को समाप्त करने की मांग भी की गई है, जिससे दिव्यांगजनों को यात्रा में राहत मिल सके।
संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो वे व्यापक आंदोलन करने को बाध्य होंगे, जिसका खामियाजा सरकार को भुगतना पड़ सकता है। उनका कहना है कि यह केवल मांगों का मामला नहीं है, बल्कि सम्मान, अधिकार और समान अवसर की लड़ाई है, जिसे अब और अधिक समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।