पहाड़ की परंपरा में नहीं गणपति विसर्जन, घर में विराजेंगे बप्पा
देहरादून : गणेश चतुर्थी पर देश के अलग-अलग हिस्सों में गणपति प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा है, लेकिन उत्तराखंड की पर्वतीय संस्कृति में गणेशजी को घर के स्थायी मंगलकर्ता और रक्षक के रूप में विराजमान रखने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। इसी लोक परंपरा को ध्यान में रखते हुए इस बार देहरादून में कई परिवार और धार्मिक संगठन गणपति स्थापना के बाद विसर्जन के बजाय प्रतिमा को घर या मंदिर में ही रखने और नियमित पूजा-अर्चना करने का विकल्प अपना रहे हैं। कुछ स्थानों पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर कृत्रिम जलकुंड में प्रतीकात्मक विसर्जन के बाद प्रतिमा को घर-मंदिर में रखने की व्यवस्था भी की जा रही है।
पटेलनगर स्थित गणपति महोत्सव समिति ने ‘विसर्जन नहीं करेंगे, सिर्फ पूजा होगी और महोत्सव मनाएंगे’ अभियान शुरू किया है। समिति के अध्यक्ष तेजेंद्र हरजाई के अनुसार देवभूमि में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा नहीं रही है। समिति की इस पहल का लोगों ने स्वागत किया है। हरिद्वार और रुड़की के कुछ धार्मिक संगठनों ने भी गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं करने का निर्णय लिया है।
दीपलोक कालोनी स्थित श्रीराम मंदिर सहित कुछ परिवारों ने भी गणपति स्थापना के बाद प्रतिमा को विसर्जित करने के बजाय घर या मंदिर में ही विराजमान रखने का निर्णय लिया है। यहां मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने, कृत्रिम जलकुंड में प्रतीकात्मक विसर्जन करने और इसके बाद प्रतिमा को घर-मंदिर में रखने जैसे विकल्प अपनाए जा रहे हैं।
परम विहार स्थित श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी पंडित विनोद बंगवाल ने बताया कि मंदिर में पिछले 11 वर्षों से गणेश उत्सव आयोजित किया जा रहा था। पिछले वर्ष आयोजकों ने उत्तराखंड की परंपरा को ध्यान में रखते हुए गणेश प्रतिमा का विसर्जन नहीं करने का निर्णय लिया था। इसी कारण इस बार नया आयोजन नहीं किया गया। मंदिर में पहले से स्थापित गणेशजी की नियमित पूजा-अर्चना की जा रही है।
वहीं, श्री सनातन धर्म मंदिर नेहरू कालोनी के पंडित दीनबंधु तिवारी के अनुसार मंदिर में स्थापित गणेशजी की प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता। उनका कहना है कि उत्तराखंड में गणेशजी की पूजा और उन्हें घर-मंदिर में विराजमान रखने की परंपरा रही है।
उत्तराखंड विद्वत सभा के प्रवक्ता आचार्य बिपिन डोभाल के अनुसार सार्वजनिक गणेश उत्सव और प्रतिमा विसर्जन उत्तराखंड की पारंपरिक पर्वतीय संस्कृति का पुराना हिस्सा नहीं रहा है। पहाड़ के पारंपरिक घरों में खोली के ऊपर गणेशजी की स्थायी स्थापना की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में गणेश उत्सव की अलग धार्मिक-सामाजिक परंपराएं हैं, जबकि उत्तराखंड में सार्वजनिक गणेश उत्सव और विसर्जन की परंपरा पिछले कुछ दशकों में अधिक प्रचलित हुई है।
आचार्य डोभाल के अनुसार पौराणिक परंपरा में बदरीकाश्रम में व्यास द्वारा महाभारत की रचना और गणेशजी द्वारा उसे लिखे जाने का उल्लेख मिलता है। उनका कहना है कि इस पहल का उद्देश्य किसी परंपरा का विरोध करना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की स्थानीय धार्मिक परंपराओं और लोकाचार को समझना है।
बदरीकाश्रम ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य पीठ व्यास के आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं के अनुसार यज्ञ और अनुष्ठानों में गणेश-लक्ष्मी का आह्वान कर उन्हें घर में विराजमान रखने की कामना की जाती है। उनके धार्मिक मत के अनुसार गणेशजी के साथ रिद्धि-सिद्धि तथा लाभ, बुद्धि, क्षेम और सिद्धि की अवधारणा जुड़ी हुई है। ऐसे में गणेशजी को विसर्जित करने के बजाय उनकी निरंतर पूजा-अर्चना की जानी चाहिए। वह गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक की परंपरा को बदरीकाश्रम और महाभारत के प्रसंग से भी जोड़ते हैं।