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बच्चों में बढ़ता चिड़चिड़ापन : कारण और समाधान

सलीम रज़ा (पत्रकार)

आजकल यह देखा जा रहा है कि बच्चों में चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाना, गुस्सा दिखाना, बातों को न सुनना और तुरंत प्रतिक्रिया देना अब बच्चों में आम हो गया है। पहले जहां बच्चे सरल और सहज स्वभाव के होते थे, वहीं अब उनमें अधैर्य और तनाव के लक्षण देखने को मिल रहे हैं। यह बदलाव केवल पारिवारिक माहौल से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और तकनीकी परिवेश से भी जुड़ा हुआ है।

परिवार में बदलते रिश्ते और समय की कमी सबसे प्रमुख कारणों में से हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता के पास बच्चों को पर्याप्त समय नहीं होता। बच्चे भावनात्मक रूप से अपने माता-पिता से दूरी महसूस करते हैं। जब उनकी छोटी-छोटी भावनाओं को समझा नहीं जाता, तो उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है। परिवार के सदस्यों के बीच संवाद की कमी और संयुक्त परिवारों के टूटकर एकल परिवारों में बदल जाने से बच्चों को वह वातावरण नहीं मिल पा रहा, जहां वे अपनी भावनाओं को सहजता से व्यक्त कर सकें।

तकनीकी बदलाव भी इसका एक बड़ा कारण है। मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम और इंटरनेट बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इन उपकरणों का लगातार प्रयोग न केवल उनकी एकाग्रता और सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करता है, बल्कि उन्हें आक्रामक और अधीर भी बनाता है। स्क्रीन पर घंटों समय बिताने से वे सामाजिक गतिविधियों और खेलकूद से दूर हो जाते हैं। इससे उनका मानसिक संतुलन प्रभावित होता है और वे अधिक चिड़चिड़े हो जाते हैं।

शिक्षा व्यवस्था और प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बच्चों पर गहराई से असर डालता है। छोटे-से बच्चे को भी अब उच्च अंक लाने और हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की उम्मीदें झेलनी पड़ती हैं। अभिभावक और शिक्षक की अपेक्षाएं बच्चों पर भारी पड़ती हैं। जब बच्चा उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो उसे निराशा घेर लेती है और यही निराशा गुस्से व चिड़चिड़ेपन का रूप ले लेती है।

अनियमित जीवनशैली और खानपान की आदतें भी इस समस्या को बढ़ाती हैं। बच्चों के भोजन में पौष्टिक तत्वों की कमी, जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक जैसी चीज़ों का बढ़ता सेवन उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। नींद पूरी न होना भी बच्चों के स्वभाव को असंतुलित कर देता है। जब बच्चा पर्याप्त नींद नहीं लेता, तो उसका मस्तिष्क थका रहता है और वह छोटी-सी बात पर चिड़चिड़ा हो उठता है।

सामाजिक कारणों को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। आजकल बच्चों को समाज में असुरक्षा और तनाव का माहौल देखने को मिलता है। चाहे वह समाचारों के माध्यम से हिंसा की घटनाएं हों या आस-पड़ोस का अस्थिर वातावरण, यह सब बच्चों की मानसिकता पर असर डालते हैं। माता-पिता के बीच झगड़े और तनावपूर्ण माहौल भी बच्चों को भीतर से असुरक्षित बना देता है।

बच्चों में बढ़ते चिड़चिड़ेपन को कम करने के लिए सबसे ज़रूरी है कि उन्हें पर्याप्त समय और प्यार दिया जाए। माता-पिता को बच्चों की बातों को ध्यान से सुनना चाहिए और उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को समझना चाहिए। बच्चों को खेलकूद, संगीत, कला और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए, ताकि उनकी ऊर्जा सही दिशा में खर्च हो सके। तकनीक के उपयोग पर नियंत्रण और पौष्टिक आहार के साथ नियमित दिनचर्या उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से संतुलित बनाती है।

अगर हम बच्चों को सहानुभूति और समझदारी से मार्गदर्शन देंगे तो उनका चिड़चिड़ापन धीरे-धीरे कम होगा और वे आत्मविश्वासी, खुशमिजाज और संतुलित जीवन जीने की ओर अग्रसर होंगे। बच्चों की मासूमियत और उनकी सकारात्मक ऊर्जा को बनाए रखने की जिम्मेदारी परिवार, समाज और शिक्षा प्रणाली—तीनों की है। यही सामूहिक प्रयास आने वाली पीढ़ी को मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ बना सकता है।

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