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सौर ऊर्जा नीति ने रोका विस्तार, ऑप्टो इलेक्ट्रॉनिक को 600 किलोवाट अतिरिक्त मंजूरी नहीं

देहरादून: ऑप्टो इलेक्ट्रॉनिक फैक्ट्री, जो सैन्य साजो-सामान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, को अपनी सौर ऊर्जा परियोजना की क्षमता बढ़ाने की दिशा में बड़ा झटका लगा है। राज्य के नियामक आयोग ने फैक्ट्री द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने सोलर पावर उत्पादन की वर्तमान क्षमता में 600 किलोवाट की अतिरिक्त वृद्धि की अनुमति मांगी थी। इस फैसले से फैक्ट्री की अक्षय ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाने की योजना को फिलहाल बड़ा झटका लगा है।

फैक्ट्री ने पहले से ही अपने परिसर में 400 किलोवाट और 600 किलोवाट क्षमता के दो सोलर प्रोजेक्ट स्थापित कर रखे हैं, जो कुल मिलाकर एक मेगावाट का उत्पादन करते हैं। वर्ष 2023 में संस्थान ने अपनी हरित ऊर्जा पहल को आगे बढ़ाते हुए नियामक प्राधिकरण से अतिरिक्त 600 किलोवाट क्षमता जोड़ने की अनुमति मांगी थी। लेकिन उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) ने इस प्रस्ताव को स्वीकृति देने से इंकार कर दिया, जिस पर कंपनी ने नियामक आयोग का रुख किया।

हाल ही में दिए गए अपने आदेश में नियामक आयोग ने स्पष्ट किया कि राज्य की सौर ऊर्जा नीति के तहत किसी भी औद्योगिक या संस्थागत उपभोक्ता को एक मेगावाट से अधिक की सौर उत्पादन क्षमता स्थापित करने की अनुमति नहीं है। आयोग ने यह भी कहा कि नीति के तहत निर्धारित सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता और इसमें किसी प्रकार की रियायत या अपवाद की गुंजाइश फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब देशभर में सरकारी और निजी संस्थान पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से हटकर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से अग्रसर हो रहे हैं। ऑप्टो इलेक्ट्रॉनिक फैक्ट्री की योजना थी कि वह अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरी तरह सौर ऊर्जा से पूरा कर सके, जिससे न केवल पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जा सके बल्कि ऊर्जा लागत में भी कमी लाई जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं की सीमा को लेकर राज्य की नीति में कुछ लचीलापन होना चाहिए, खासकर उन संस्थानों के लिए जो रक्षा, तकनीकी या उत्पादन के क्षेत्र में कार्यरत हैं और जिनकी ऊर्जा खपत अपेक्षाकृत अधिक होती है। इस प्रकार की परियोजनाएं राज्य के ऊर्जा उत्पादन की स्वावलंबिता और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी लाभकारी हो सकती हैं।

हालांकि, नियामक आयोग के फैसले के बाद फैक्ट्री के पास दो विकल्प बचे हैं—या तो वह राज्य सरकार से नीति में बदलाव की मांग करे, या फिर भविष्य में केंद्र सरकार की गाइडलाइनों के अनुरूप किसी वैकल्पिक मॉडल के तहत अपनी सौर परियोजना का विस्तार करे। फिलहाल, फैक्ट्री को एक मेगावाट की सीमा में रहकर ही अपनी सौर ऊर्जा आवश्यकताओं का प्रबंधन करना होगा।

यह मामला राज्य में अक्षय ऊर्जा नीतियों और औद्योगिक संस्थानों की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। आने वाले समय में अगर नीति में कोई संशोधन नहीं होता है, तो अन्य संस्थानों की सौर ऊर्जा विस्तार योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

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