Wed. Apr 22nd, 2026

बारिश ने छोड़ा दर्द और बेबसी का मंजर, आँसूओं में डूबा शहर

(सलीम रज़ा पत्रकार)

उत्तराखंड की धरती को लोग देवभूमि कहते हैं। यहाँ की वादियाँ, जंगल और नदियाँ लोगों को हमेशा से आकर्षित करती रही हैं। लेकिन जब यही नदियाँ रौद्र रूप धारण कर लेती हैं तो सब कुछ तहस-नहस कर देती हैं। हाल ही में देहरादून और आसपास के इलाकों में हुई मूसलाधार बारिश ने ऐसा ही दृश्य बना दिया। यह बारिश केवल बरसात नहीं थी, बल्कि लोगों की ज़िंदगी पर टूटा हुआ एक कहर था।

बरसात की रात ने नींद छीन ली। कहीं सड़कें बह गईं, कहीं पुल टूट गए। मसूरी-देहरादून मार्ग पर पुल क्षतिग्रस्त हो गया, मालदेवता के पास सौंग नदी ने पूरी सड़क ही निगल ली। देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर जाखन नदी के पास बना पुल टूटने से गाड़ियों की लंबी कतारें लग गईं। लोग घंटों तक फंसे रहे। जिन्हें अस्पताल जाना था, जिनकी कोई जरूरी ज़रूरत थी, उनके लिए यह इंतज़ार असहनीय था।

गाँवों और मोहल्लों में हालात और भी बुरे थे। निचले इलाकों में रहने वाले परिवारों के घरों में पानी घुस आया। मिट्टी की दीवारें गिर गईं, पक्के मकानों में भी दरारें पड़ गईं। जिन बच्चों ने कभी बाढ़ का नाम भी नहीं सुना था, उनकी आँखों में डर और आंसू थे। बूढ़े लोग हाथ जोड़कर बस दुआ कर रहे थे कि यह सैलाब उनके अपनों को सुरक्षित छोड़ जाए।

खेती-बाड़ी करने वाले किसान सबसे ज्यादा टूटे। उनकी फसलें, जिनके लिए उन्होंने दिन-रात मेहनत की, कुछ ही घंटों में बह गईं। खेतों में सिर्फ कीचड़ और बर्बादी बची। यह दृश्य देखकर उनकी आँखों में आंसू रुक नहीं रहे।

इस आफत की घड़ी में सरकार और प्रशासन जरूर जुटा है। मंत्री सतपाल महाराज ने पुलों और सड़कों को दुरुस्त करने के निर्देश दिए हैं। कहीं वैली ब्रिज बनाया जा रहा है, कहीं वैकल्पिक मार्ग खोले जा रहे हैं। लेकिन जो दर्द लोगों के दिल में उतर गया है, उसे मिटाना आसान नहीं है। घर का उजड़ना, रोज़गार का खत्म होना, बच्चों की पढ़ाई का रुकना — यह सब इंसान की आत्मा को झकझोर देता है।

यह जलप्रलय हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि प्रकृति से खिलवाड़ करना भारी पड़ सकता है। पेड़ों का कटना, नदियों के किनारे कब्जा करना और बेतरतीब निर्माण करना—इन सबका परिणाम हमें ऐसे ही भयावह रूप में भुगतना पड़ता है।

देहरादून का यह जल प्रलय सिर्फ खबर नहीं है। यह उन परिवारों की चीख है जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपना सब कुछ डूबते देखा। यह उन मासूम बच्चों का डर है जो हर तेज बारिश पर सहम जाते हैं। यह उन बुजुर्गों की बेबसी है जो अपनी झोपड़ी में बैठकर भगवान से रहम की भीख मांगते हैं।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम इस त्रासदी से सबक लेंगे? क्या हम प्रकृति का सम्मान करेंगे और उसे बचाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे? अगर नहीं, तो आने वाले सालों में ऐसी त्रासदियाँ और भी विकराल रूप ले सकती हैं।

देहरादून का यह जलप्रलय हमें रुला जाता है, हमें चेतावनी देता है और हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली सुरक्षा विकास में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में है।

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