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तीन साल की कैद और तड़प के बाद पिता की मौत, बेटी अब भी सन्नाटे में

महोबा : उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से सामने आई एक घटना ने इंसानियत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक रिटायर्ड रेलवे कर्मचारी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, जबकि उसकी मानसिक रूप से कमजोर बेटी उसी घर में बेहद अमानवीय हालात में पाई गई। आरोप है कि जिन लोगों को पिता-बेटी की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उन्होंने ही दोनों को वर्षों तक कैद, भूखा और उपेक्षित रखा।

शहर की हिंद टायर वाली गली में स्थित एक पुराने मकान में सोमवार को जब 70 वर्षीय ओमप्रकाश सिंह राठौर की मौत की खबर फैली, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि इसके पीछे इतनी भयावह कहानी छिपी है। रेलवे से सीनियर क्लर्क पद से सेवानिवृत्त ओमप्रकाश वर्षों से अकेले अपनी मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटी रश्मि के साथ रह रहे थे। पत्नी रेणुका का देहांत 2016 में हो चुका था और बेटी के इलाज व देखभाल की जिम्मेदारी पूरी तरह पिता पर थी।

परिजनों का आरोप है कि कुछ वर्ष पहले ओमप्रकाश ने एक दंपती को बेटी की देखभाल के लिए रखा था। धीरे-धीरे वही लोग घर पर हावी हो गए। बताया जा रहा है कि पिता और बेटी को मकान के निचले हिस्से में एक कमरे में बंद कर दिया गया, जहां न तो उन्हें ठीक से भोजन मिला और न ही किसी तरह का इलाज। तीन साल तक उन्हें बाहरी दुनिया से काट दिया गया। रिश्तेदार जब मिलने आते, तो नौकर दंपती किसी न किसी बहाने से उन्हें लौटा देते थे।

सोमवार को ओमप्रकाश की मौत की सूचना मिलने पर जब भाई अमर सिंह और अन्य परिजन घर पहुंचे, तो उन्होंने जो दृश्य देखा, उसने सबको भीतर तक झकझोर दिया। ओमप्रकाश का शव कमरे में पड़ा था और पास ही बेटी रश्मि बेहद कमजोर, भयभीत और बदहवास हालत में बैठी मिली। उसके चेहरे पर डर और असहायता साफ झलक रही थी, मानो उसने लंबे समय तक यातनाओं का सन्नाटा झेला हो।

परिजनों का आरोप है कि नौकर दंपती ने न केवल पिता-बेटी को कैद कर रखा, बल्कि उनकी संपत्ति पर भी कब्जा कर लिया। इलाज न कराए जाने और भोजन की कमी के कारण ही ओमप्रकाश की मौत हुई, ऐसा परिवार का कहना है। वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि वर्षों तक यह सब चलता रहा और किसी को इसकी भनक क्यों नहीं लगी।

पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत के वास्तविक कारण स्पष्ट होंगे और सभी आरोपों की गहराई से पड़ताल की जाएगी।

यह घटना केवल एक मौत की कहानी नहीं है, बल्कि उस चुप्पी की भी कहानी है, जो वर्षों तक एक पिता और उसकी असहाय बेटी के दर्द को ढकती रही। महोबा की यह त्रासदी समाज को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि कहीं भरोसे के नाम पर हम अपने सबसे कमजोर लोगों को गलत हाथों में तो नहीं सौंप देते।

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