चुनाव आयोग में घमासान! 14 आपत्तियों से मचा हड़कंप
भारतीय चुनाव व्यवस्था को लेकर एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है, जिसने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के प्रबंधन पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल के मुताबिक, पिछले दस महीनों में चुनाव आयोग के दो निर्वाचन आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने, डिजिटल सिस्टम और आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से बताया गया है।
मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये सवाल किसी बाहरी राजनीतिक दल या संगठन की ओर से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के भीतर से उठाए गए हैं। ऐसे में बहस केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि चुनावी पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और निर्वाचन प्रक्रिया में जनता के भरोसे तक पहुंच जाती है।
डिजिटल सिस्टम के केंद्रीकरण पर सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग का नया डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET लगभग एक अरब मतदाताओं से जुड़ी सेवाओं के लिए एकीकृत तकनीकी आधार के तौर पर विकसित किया गया है। आयोग ने जनवरी में इसके लॉन्च के समय इसे कानून के अनुरूप, पारदर्शिता बढ़ाने और जनता का विश्वास मजबूत करने वाला प्लेटफॉर्म बताया था।
हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार आयोग के भीतर इस बात को लेकर चिंता जताई गई कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने वाले जमीनी अधिकारियों, खासकर निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों, की डिजिटल पहुंच और अधिकार कहीं सीमित तो नहीं किए जा रहे हैं।
विवेक जोशी ने मई में मतदाता आंकड़ों के कथित “क्रमिक केंद्रीकरण” को लेकर चिंता जताई और स्वतंत्र तकनीकी जांच का प्रस्ताव रखा। उनका सुझाव था कि किसी बाहरी विशेषज्ञ संस्था से यह प्रमाणित कराया जाए कि मतदाता आंकड़ों में बदलाव करने की अनुमति केवल उन्हीं अधिकारियों के पास है जिन्हें कानून के तहत यह अधिकार प्राप्त है।
यहीं से एक बड़ा सवाल सामने आता है—अगर कानून किसी स्थानीय वैधानिक अधिकारी को मतदाता सूची से जुड़े निर्णय का अधिकार देता है, तो डिजिटल सिस्टम में उस अधिकार का वास्तविक नियंत्रण किस स्तर पर होना चाहिए? क्या तकनीक केवल प्रक्रिया को आसान बनाने का माध्यम है या फिर उसके जरिए निर्णय लेने की शक्ति का केंद्रीकरण भी हो सकता है?
फॉर्म-6 को लेकर भी आपत्ति
रिपोर्ट में नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले **फॉर्म-6** को लेकर भी आपत्तियों का जिक्र है। बताया गया है कि फॉर्म में ऐसे सवाल शामिल किए गए जिनका संबंध पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से था।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई और सवाल उठाया कि नियमों में बदलाव किए बिना ऐसा करना उचित था या नहीं। बाद में संधू ने कथित तौर पर इसे “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए हटाने की मांग भी दर्ज की।
इससे एक अहम सवाल सामने आता है कि पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिक के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया कितनी सरल और स्पष्ट होनी चाहिए। साथ ही, यदि आयोग के भीतर किसी प्रक्रिया पर लिखित आपत्ति दर्ज होती है, तो उस आपत्ति और उसके निस्तारण की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए—यह सवाल भी अब बहस का हिस्सा बन गया है।
कैबिनेट सचिव तक पहुंचा विवाद
रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा जुलाई में सामने आए प्रशासनिक विवाद से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने आयोग के भीतर उठे विवाद के बाद सीधे कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा।
दोनों आयुक्तों ने एक ऐसे आदेश पर आपत्ति जताई, जिसके बारे में उनका कहना था कि इससे सूचना प्रौद्योगिकी विभाग पर निगरानी की एक महत्वपूर्ण परत हट रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने बाद में उस आदेश को अलग रख दिया।
यह घटनाक्रम आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसके संस्थागत ढांचे को लेकर सवाल खड़े करता है। कानून के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त आयोग के सदस्य होते हैं और मतभेद की स्थिति में बहुमत से निर्णय लेने का प्रावधान है। आयोग के कामकाज और जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर भी सामूहिक निर्णय की व्यवस्था है।
सियासत भी गरमाने के आसार
इन खुलासों का राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है। विपक्ष पहले से ही एसआईआर , मतदाता सूची में बदलाव और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाता रहा है और इसे ‘वोट चोरी’ जैसे आरोपों से जोड़ता रहा है।
ऐसे में आयोग के भीतर दो निर्वाचन आयुक्तों की ओर से बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की खबर ने राजनीतिक बहस को एक नया आधार दे दिया है। विपक्ष इन घटनाक्रमों को चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जोड़ सकता है।
हालांकि, यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट यह दावा नहीं करती कि इन प्रक्रियागत विवादों के कारण किसी चुनाव का परिणाम प्रभावित हुआ। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि जिन सीटों पर विशेष पुनरीक्षण के दौरान हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी, वहां जीत दोनों प्रमुख दलों के बीच लगभग बंटी हुई थी।
यानी उपलब्ध रिपोर्ट से चुनाव परिणामों पर सीधा प्रभाव साबित नहीं होता। लेकिन मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर संस्थागत भरोसे का सवाल जरूर सामने आता है।
अब जवाबदेही पर निगाह
पूरे विवाद के केंद्र में कुछ बुनियादी सवाल हैं—मतदाता सूची पर डिजिटल नियंत्रण किसके पास है? सॉफ्टवेयर में बदलाव कौन कर सकता है? वैधानिक अधिकारियों की शक्तियां तकनीकी स्तर पर किस तरह लागू होती हैं? आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई? और क्या इन व्यवस्थाओं का स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराया जा सकता है?
क्योंकि चुनाव आयोग से देश केवल निष्पक्ष चुनाव कराने की उम्मीद नहीं करता। उससे यह भरोसा भी अपेक्षित है कि मतदाता का नाम कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर तय होगा, तकनीक पारदर्शिता बढ़ाने का माध्यम होगी और आयोग के भीतर उठने वाली गंभीर आपत्तियों का जवाब संस्थागत तरीके से सामने आएगा।
ऐसे में द इंडियन एक्सप्रेस की यह पड़ताल एसआईआर से लेकर मतदाता सूची और चुनाव आयोग की डिजिटल कार्यप्रणाली तक चल रही बहस को और तेज कर सकती है। आने वाले दिनों में केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से इन प्रक्रियाओं, अधिकारों और डिजिटल नियंत्रण की व्यवस्था पर अधिक स्पष्ट जवाब मांगे जाने की संभावना है।