उत्तराखंड में मानसून: राहत, जोखिम और चुनौतियों का मौसम
(सलीम रज़ा )
देहरादून : उत्तराखंड में आठ दिन की देरी से पहुंचे दक्षिण-पश्चिम मानसून ने आते ही अपने खतरनाक तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। पहली ही जोरदार बारिश ने पर्वतीय इलाकों में जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। सीमांत क्षेत्रों में जगह-जगह पहाड़ दरकने लगे, भारी मलबा और बोल्डर सड़कों पर आ गिरे और नौ प्रमुख ग्रामीण सड़कें पूरी तरह बंद हो गईं। इसके चलते 40 से अधिक गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय और अन्य क्षेत्रों से टूट गया है। करीब 15 हजार लोग आवागमन, स्वास्थ्य सेवाओं और जरूरी आपूर्ति के संकट से जूझ रहे हैं। मौसम विभाग ने अगले चार दिनों तक भारी से अत्यधिक भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि मानसून का असली इम्तिहान अभी बाकी है।
सोमवार रात से शुरू हुई बारिश ने सीमांत जिले पिथौरागढ़ के कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई। डीडीहाट-पमस्यारी, आदिचौरा-सीणी, बांसबगड़-कोटा, तवाघाट-थानीधार, छेड़ा-आगर, ड्योरा-बारमो, बुंगाछीना-कुसैल, बेड़ीनाग-दौलीगाड़-पौसा तथा गलाती-रमतोली-धामी मार्गों पर भारी मलबा आने से यातायात पूरी तरह ठप हो गया। कई स्थानों पर ग्रामीण घंटों तक सड़क खुलने का इंतजार करते रहे, जबकि कुछ जगह लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर पैदल मलबा पार किया।
बारिश के कारण गांवों में दूध, सब्जियां, दवाइयां, गैस सिलेंडर और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होने लगी है। यदि अगले कुछ दिनों तक सड़कें नहीं खुलीं तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। सबसे अधिक चिंता मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को लेकर है, जिन्हें आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचाना मुश्किल हो सकता है।
राज्य में मानसून की शुरुआत ऐसे समय हुई है, जब चारधाम यात्रा भी पूरे शबाब पर है। यात्रा मार्गों पर भूस्खलन और मलबा आने का खतरा बढ़ गया है। यदि लगातार बारिश जारी रही तो यात्रा प्रभावित हो सकती है और प्रशासन के सामने यात्रियों की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगी।
मौसम विभाग के अनुसार अगले चार दिनों तक प्रदेश के कई जिलों में भारी से अत्यधिक भारी बारिश की संभावना है। नदियों और बरसाती नालों का जलस्तर बढ़ सकता है, जबकि संवेदनशील ढलानों पर नए भूस्खलन की आशंका बनी हुई है। प्रशासन ने लोक निर्माण विभाग, एसडीआरएफ, पुलिस और आपदा प्रबंधन की टीमों को हाई अलर्ट पर रखा है। बंद मार्गों को खोलने के लिए मशीनें लगाई गई हैं, लेकिन लगातार बारिश राहत कार्यों की रफ्तार को प्रभावित कर रही है।
पहली ही बारिश में बड़ा असर
9 ग्रामीण सड़कें पूरी तरह बंद।
40 से अधिक गांवों का संपर्क टूटा।
15 हजार से अधिक लोग प्रभावित।
कई गांवों में राशन और दवाइयों की आपूर्ति बाधित।
चारधाम यात्रा मार्गों पर भी बढ़ा खतरा।
अगले चार दिनों तक भारी बारिश का अलर्ट।
क्यों बढ़ रहा है खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार उत्तराखंड का अधिकांश पर्वतीय क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील भूगर्भीय संरचना वाला है। लगातार सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ों की कटिंग, अनियोजित निर्माण और जंगलों में कमी के कारण ढलानों की स्थिरता कमजोर हुई है। मानसून के दौरान जब लगातार वर्षा होती है तो मिट्टी पानी से संतृप्त होकर अपनी पकड़ खो देती है। इसके बाद मामूली कंपन या तेज बारिश भी बड़े भूस्खलन का कारण बन जाती है। यही वजह है कि हर वर्ष मानसून में सड़कें बंद होने और गांवों के संपर्क टूटने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
क्या इस बार मानसून और भारी पड़ेगा?
मानसून की शुरुआत ने ही स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि इस वर्ष पहाड़ों के लिए चुनौती सामान्य नहीं होगी। पहली ही बारिश में जिस तरह सड़कें बंद हुई हैं, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जुलाई और अगस्त में लगातार बारिश होने पर हालात कितने गंभीर हो सकते हैं। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है। कम समय में अधिक बारिश होने से अचानक बाढ़, भूस्खलन और सड़कें बहने जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब केवल राहत और बचाव पर्याप्त नहीं होगा। सड़कों की वैज्ञानिक डिजाइन, संवेदनशील ढलानों का स्थायी उपचार, बेहतर ड्रेनेज व्यवस्था, समय पर चेतावनी प्रणाली और निर्माण कार्यों में भूगर्भीय मानकों का कड़ाई से पालन ही भविष्य में नुकसान को कम कर सकता है।
फिलहाल उत्तराखंड में मानसून की दस्तक राहत से ज्यादा चेतावनी बनकर सामने आई है। आने वाले कुछ सप्ताह प्रशासन की तैयारियों, आपदा प्रबंधन की क्षमता और आम लोगों की सतर्कता की असली परीक्षा साबित हो सकते हैं। यदि मौसम विभाग का पूर्वानुमान सही साबित हुआ तो प्रदेश के कई हिस्सों में जनजीवन एक बार फिर भारी चुनौतियों का सामना कर सकता है।