बाल ठाकरे की विरासत पर क्यों कमजोर पड़ गए उद्धव ठाकरे?

(सलीम रज़ा पत्रकार )
महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी शिवसेना का नाम लिया जाता है, तो सबसे पहले जिस चेहरे की छवि उभरती है वह है बाल ठाकरे। उन्हें सिर्फ एक राजनीतिक नेता कहना उनके कद को छोटा करना होगा। वे एक विचार थे, एक आंदोलन थे और लाखों शिवसैनिकों के लिए आस्था का केंद्र थे। मुंबई की गलियों से लेकर महाराष्ट्र के छोटे-छोटे कस्बों तक उनकी आवाज को आदेश माना जाता था। मराठी में लोग कहा करते थे, साहेब ने कह दिया मतलब फैसला हो गया। यही कारण था कि उनके निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि क्या उनके बेटे उद्धव ठाकरे इस विशाल राजनीतिक विरासत को संभाल पाएंगे?
शुरुआती वर्षों में ऐसा लगा कि उद्धव ठाकरे धीरे-धीरे पार्टी को नई दिशा देंगे, लेकिन समय बीतने के साथ यह धारणा मजबूत होती गई कि वे बाल ठाकरे जैसी पकड़, प्रभाव और संगठनात्मक शक्ति कायम नहीं कर पा रहे हैं। आज जब शिवसेना दो हिस्सों में बंट चुकी है और पार्टी की पहचान को लेकर भी संघर्ष जारी है, तब यह सवाल और प्रासंगिक हो गया है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे के व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का अंतर है। बाल ठाकरे मंच पर आते थे तो भीड़ में बिजली दौड़ जाती थी। उनका भाषण केवल राजनीतिक नहीं होता था, बल्कि वह भावनाओं का विस्फोट होता था। वे मराठी अस्मिता, हिंदुत्व और क्षेत्रीय गौरव को ऐसे शब्द देते थे कि आम कार्यकर्ता खुद को आंदोलन का हिस्सा महसूस करने लगता था। मुंबई में मराठी मानुष के अधिकार की बात हो या हिंदुत्व की राजनीति, बाल ठाकरे हमेशा आक्रामक और निर्णायक दिखाई दिए।
इसके विपरीत उद्धव ठाकरे का स्वभाव शांत और संतुलित है। वे टकराव के बजाय संवाद में विश्वास करते हैं। राजनीति में यह गुण बुरा नहीं माना जाता, लेकिन शिवसेना जैसी पार्टी, जिसकी पहचान ही आक्रामक शैली रही हो, वहां कार्यकर्ता अक्सर अपने नेता में वही तेवर खोजते हैं। महाराष्ट्र के कई पुराने शिवसैनिक आज भी कहते सुनाई देते हैं, बालासाहेब की दहाड़ ही अलग थी। यही तुलना उद्धव ठाकरे के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई।
दूसरा बड़ा कारण संगठन पर नियंत्रण का कमजोर होना रहा। बाल ठाकरे के दौर में शिवसेना एक व्यक्ति केंद्रित संगठन थी। अंतिम निर्णय वही लेते थे और किसी भी नेता की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह उनके खिलाफ खड़ा हो सके। लेकिन उनके जाने के बाद पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्र बनने लगे। उद्धव ठाकरे ने संगठन को आधुनिक ढांचे में ढालने की कोशिश की, मगर वे कार्यकर्ताओं के साथ वह भावनात्मक रिश्ता नहीं बना पाए जो बाल ठाकरे का सबसे बड़ा हथियार था।
राजनीति में केवल पद या अधिकार पर्याप्त नहीं होते, कार्यकर्ताओं के दिलों पर पकड़ भी जरूरी होती है। यही वह जगह थी जहां उद्धव ठाकरे कमजोर दिखाई दिए। धीरे-धीरे पार्टी के भीतर ऐसे नेता उभरने लगे जिनकी अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ थी। जब संगठन के शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बढ़ती है, तब असंतोष भी बढ़ता है। आगे चलकर यही असंतोष पार्टी के बड़े विभाजन का कारण बना।
2019 का राजनीतिक घटनाक्रम भी उद्धव ठाकरे की छवि पर भारी पड़ा। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना ने उन दलों के साथ सरकार बनाई जिनके खिलाफ वह वर्षों तक राजनीतिक संघर्ष करती रही थी। सत्ता की राजनीति में गठबंधन कोई नई बात नहीं है, लेकिन शिवसेना के पारंपरिक समर्थकों के लिए यह फैसला सहज नहीं था। पार्टी की पहचान लंबे समय तक हिंदुत्व और भाजपा के साथ गठबंधन से जुड़ी रही थी। ऐसे में जब राजनीतिक समीकरण बदले, तो कार्यकर्ताओं के एक वर्ग को लगा कि पार्टी अपनी मूल विचारधारा से दूर जा रही है।
महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में उस समय एक चर्चा आम थी सत्ता मिल गई, लेकिन क्या शिवसेना खो गई?। यह सवाल केवल विपक्ष नहीं पूछ रहा था, बल्कि पार्टी के भीतर भी कई लोग इसे लेकर असहज थे। विरोधियों ने इसी मुद्दे को हथियार बनाया और यह संदेश देने की कोशिश की कि बाल ठाकरे की शिवसेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना में अंतर आ गया है।
उद्धव ठाकरे के सामने एक और समस्या यह रही कि वे अपने पिता की तरह जनसभाओं और सड़कों की राजनीति के नेता नहीं बन सके। बाल ठाकरे भले कभी चुनाव नहीं लड़े, लेकिन जनता के बीच उनकी मौजूदगी लगातार बनी रहती थी। उनके भाषण राजनीतिक घटनाएं बन जाते थे। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे अधिक प्रशासनिक नेता के रूप में सामने आए। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनकी छवि एक प्रबंधक की रही, जनांदोलन के नेता की नहीं।
कोविड-19 महामारी के दौरान उनके काम की प्रशंसा हुई, लेकिन राजनीति केवल प्रशासन से नहीं चलती। भारतीय राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव और जनसंपर्क की भी बड़ी भूमिका होती है। यही वह क्षेत्र था जहां उनके विरोधियों को हमला करने का मौका मिला।
शिवसेना के विभाजन ने उद्धव ठाकरे की राजनीतिक कठिनाइयों को और बढ़ा दिया। जब पार्टी के बड़े हिस्से ने अलग रास्ता चुना, तो यह केवल राजनीतिक संकट नहीं था, बल्कि नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल था। किसी भी दल में विद्रोह होना सामान्य बात है, लेकिन जब बड़ी संख्या में विधायक और सांसद नेतृत्व छोड़ दें, तो यह संकेत देता है कि संगठन के भीतर गंभीर असंतोष मौजूद था।
बाल ठाकरे के समय शायद ऐसी स्थिति की कल्पना भी मुश्किल थी। उनकी व्यक्तिगत पकड़ इतनी मजबूत थी कि असहमति रखने वाले नेता भी खुलकर विद्रोह करने से बचते थे। यही कारण है कि कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उद्धव ठाकरे अपने पिता की सबसे बड़ी ताकत—संगठनात्मक अनुशासन—को बनाए रखने में सफल नहीं रहे।
हालांकि पूरी कहानी का दूसरा पक्ष भी है। यह कहना उचित नहीं होगा कि उद्धव ठाकरे पूरी तरह असफल रहे हैं। उन्होंने शिवसेना को केवल आक्रामक क्षेत्रीय दल के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने विकास, प्रशासन और गठबंधन राजनीति पर भी जोर दिया। लेकिन समस्या यह रही कि इस बदलाव को पार्टी के पारंपरिक समर्थकों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचाया जा सका।
असल में उद्धव ठाकरे एक दुविधा में फंस गए। यदि वे पूरी तरह बाल ठाकरे की शैली अपनाते, तो बदलते राजनीतिक दौर में पार्टी को विस्तार देने में कठिनाई होती। और यदि वे नई राजनीति की ओर बढ़ते, तो पुराने समर्थकों को लगता कि पार्टी अपनी जड़ों से दूर जा रही है। इसी संतुलन की लड़ाई में उनकी राजनीतिक पूंजी लगातार कमजोर होती गई।
महाराष्ट्र की राजनीति में आज भी बाल ठाकरे का नाम भावनाओं से जुड़ा हुआ है। कई पुराने शिवसैनिक कहते हैं,बालासाहेब कोई व्यक्ति नहीं, एक भावना थे। किसी भावना की विरासत संभालना किसी राजनीतिक दल की कमान संभालने से कहीं ज्यादा कठिन होता है। उद्धव ठाकरे के सामने यही चुनौती रही है।
निष्कर्षतः, उद्धव ठाकरे के लिए सबसे बड़ी समस्या विपक्ष नहीं, बल्कि तुलना रही है। उनकी तुलना हमेशा बाल ठाकरे से की गई और शायद आगे भी होती रहेगी। नेतृत्व शैली का अंतर, संगठन पर कमजोर पकड़, वैचारिक भ्रम, राजनीतिक गठबंधन, जमीनी कार्यकर्ताओं से दूरी की धारणा और पार्टी विभाजन जैसे कारणों ने उनकी राह कठिन बना दी। यही वजह है कि वे अब तक बाल ठाकरे की विरासत को उसी प्रभाव, उसी आक्रामकता और उसी जनस्वीकृति के साथ आगे बढ़ाने में सफल नहीं दिखे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में यह कहानी केवल एक पिता-पुत्र की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की भी है जिसमें एक विशाल विरासत को नए दौर की राजनीति में जीवित रखने की कोशिश की जाती है।