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शिक्षक बना रहे भविष्य, लेकिन खुद के बुढ़ापे का सहारा नहीं

जोधपुर : शिक्षक बच्चों को आदर्श शिक्षा देकर देश का भावी नागरिक बनाता हैं और आज वहीं शिक्षक अपने और अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए पेंशन को तरस गया हैं । हमारे देश के जन प्रतिनिधि सरकारी कर्मचारी नहीं है अपितु वे जनता के प्रतिनिधि है फिर भी पांच साल की सेवा के बाद पेंशन के नाम पर मोटी रकम व सुविधाएं सरकार से ले रहे हैं वहीं दूसरी ओर अनुदानित शिक्षण संस्थाओं के समायोजित शिक्षक आज पेंशन को तरस रहें हैं । यह कैसी विडम्बना है ।

सरकारी अनुदानित शिक्षण संस्थान में कार्यरत शिक्षकों ने बताया कि उन्होंने लंबे समय तक अनुदानित शिक्षण संस्थान में शिक्षक के रुप में अपनी सेवाएं दी । बाद में राजस्थान सरकार ने अनुदानित शिक्षण संस्थाओं के शिक्षकों को समायोजित करते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में नियुक्त कर दिया लेकिन सेवानिवृत्त के बाद कोई पेंशन नहीं दी जिससे बिना पेंशन के जीवन यापन करना कठिन हो गया है ।

बताया जाता है कि राजस्थान सरकार ने 80 प्रतिशत अनुदानित शिक्षण संस्था़ओं में कार्यरत शिक्षकों को 01 जुलाई 2011 से सरकारी स्कूलों में ( ग्रामीण स्कूलों में ) समायोजन के नाम पर लगाया और सेवाकाल के दौरान 9 – 18  – 27 का लाभ भी दिया और सर्विस बुक भी पहले वाली को लगातार जारी रखा , लेकिन सेवानिवृति के बाद उन शिक्षको को यह कहकर पेंशन से वंचित कर दिया कि उनकी सेवाएं 10 साल नहीं हुई । पेंशन नहीं मिलने से वे आर्थिक कठिनाईयों के दौर से गुजर रहे हैं और येन केन प्रकारेण अपने परिवार को दो वक्त की रोटी उपलब्ध करा पा रहें हैं ।‌ सरकार एक ओर नारा देती है कि कोई भूखा न सोए , वही दूसरी ओर समायोजित शिक्षकों व कर्मचारियों को पेंशन से वंचित कर दिया है ।

राजस्थान सरकार ने समायोजन के दौरान इन शिक्षकों से एक शपथ पत्र भरवा लिया था कि वे ग्रामीण इलाकों में सरकारी नौकरी करते पुराने कोई लाभ की मांग नहीं करेगे । उक्त शर्त तर्कसंगत नहीं है । चूंकि सर्विस बुक को लगातार जारी रखा , 9-18 का लाभ भी दिया । स्कूल अनुदानित शिक्षण संस्थान थी फिर सेवाकाल के बीच में कर्मचारियों के विरूध्द यह कैसी शर्त रखी कि उनका भविष्य अधर में लटक गया । चालू पुरानी सेवा के बीच सरकार ने इन शिक्षकों से यह शपथ पत्र लेकर उनके जीवन से खिलवाड़ कर लिया ।

एक ओर सरकार अपने आपकों लोक कल्याणकारी सरकार कहती है और समानता की बात करती है और साथ ही साथ कर्मचारियों को पेंशन से भी वंचित कर रही हैं । ये कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि से सरकारी कर्मचारी है जबकि सरकार उन्हें 01 जुलाई 2011 से सरकारी कर्मचारी मान रही है व पेंशन के लिए कम से कम दस साल की सेवा की बात कर रही है जबकि उनकी सेवा समायोजन के बाद आठ नौ साल की सेवाएं हुई लेकिन सरकार ने शपथ पत्र लिया वह तर्क संगत नहीं है सभी शिक्षक अपनी प्रथम नियुक्ति से शिक्षक है । इसलिए राजस्थान सरकार समायोजित शिक्षकों को पेंशन देंने के लिए गणना 1 जुलाई 2011 से न कर उनकी प्रथम नियुक्ति से गणना कर पेंशन का लाभ दें । चूकि कर्मचारियों ने अपने जीवन का अमूल्य समय अधिकांश साल तो अनुदानित शिक्षण संस्थाओं में अपनी सेवाएं दे चुके हैं । अब उन्हें पेंशन से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता हैं ।

राज्य सरकार बार बार यह दौहरा रही हैं कि हमने ओल्ड पेंशन स्कीम ( ओ पी एस ) योजना शुरू कर दी है लेकिन समायोजित शिक्षकों को ओल्ड पेंशन स्कीम का लाभ देने के बारे में मौन धारण कर रखा हैं जिससे इस मंहगाई के दौर में उन्हें अपना व अपने परिवारजनों का जीवन व्यापन करना मुश्किल हो गया है । अतः सरकार तत्काल सभी कर्मचारियों को प्रथम नियुक्ति तिथि से पेंशन दें व अनावश्यक रूप से जोडी गई शर्त वापस लें । जब ओल्ड पेंशन स्कीम लागू की हैं तो फिर समायोजित शिक्षकों को इस लाभ से वंचित करना न्याय संगत नहीं कहा जा सकता है ।

एक ओर सरकार सामाजिक सुरक्षा के नाम घर बैठे लोगों को सामाजिक सुरक्षा के नाम पर बिना कोई काम किये पेंशन दे रही है और जनप्रतिनिधियों को पांच साल के कार्यकाल के बाद पेंशन व अन्य कई सुविधाएं उपलब्ध करा रहीं हैं तो फिर अनुदानित शिक्षण संस्थाओं के उन शिक्षकों को पेंशन के हक से वंचित क्यों किया जा रहा है जिन्होंने पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी सेवाएं दी , इतना ही नहीं बच्चों का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों को पेंशन से वंचित कर रहीं हैं । यह कैसी दौहरी मानसिकता । कहां गये समानता के अधिकार । पेंशन पाना समायोजित शिक्षकों का हक हैं जो समय रहते उन्हें तत्काल प्रभाव से मिलना चाहिए । सेवानिवृत हर सरकारी कर्मचारी पेंशन का हकदार हैं और उसे सरकारी नियमानुसार सेवानिवृति पर पेंशन दी जाती है । चूंकि पेंशन कर्मचारी की खुशहाली का जीवन बीमा हैं । उसके बुढापे की लाठी हैं । इतना ही नहीं सरकार सेवानिवृत कर्मचारी को आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है़ और कर्मचारी की मृत्यु पर उसके आश्रित को पेंशन मिलती हैं । लेकिन राजस्थान में सरकारी अनुदानित शिक्षण संस्थाओं से समायोजित शिक्षक आज सेवानिवृत्ति के बाद भी पेंशन को तरस रहे हैं । जन प्रतिनिधियों को ज्ञापन भी प्रेषित किये लेकिन पेंशन दिलाना तो दूर रहा ज्ञापनों के पहुंच की प्राप्ति व उस पर की गई कार्यवाही से भी कभी अवगत नहीं कराया ।

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