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भारतीय जैन मिलन का द्वितीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक व तीर्थ रक्षा सम्मेलन सम्पन्न

देहरादून : भारतीय जैन मिलन के तत्वाधान में 31वीं पुष्प वर्षा योग समिति और जैन मिलन महावीर के सहयोग से द्वितीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक एवं जैन तीर्थ रक्षा सम्मेलन का आयोजन गांधी रोड स्थित दिगंबर जैन पंचायती जैन भवन में भव्य रूप से किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ जैन मिलन महावीर द्वारा महावीर प्रार्थना से हुआ, जिसके बाद जैन मिलन एकता द्वारा “इस काल में सदा जैन संत रहेंगे” और मूक माटी मिलन गीत प्रस्तुत कर वातावरण को धार्मिक और आध्यात्मिक रंग में रंग दिया गया। इस अवसर पर आचार्य 108 श्री सौरभ सागर जी महामुनि और संघ रत्न, संघ सेतु श्रमण संघीय उपाध्याय प्रवर श्री रविन्द्र मुनि जी महाराज का पावन सान्निध्य समाज को प्राप्त हुआ, जिससे सम्मेलन की गरिमा और अधिक बढ़ गई।

सम्मेलन में जैन मिलन ने समाज को तीर्थ रक्षा का सशक्त संदेश देते हुए कहा – “आरक्षण नहीं, संरक्षण चाहिए।” विचार-विमर्श के दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। जंगल तीर्थों के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया गया कि यह केवल भौतिक स्थल नहीं, बल्कि साधना, मुनियों और श्रावकों से जुड़ा हुआ चेतन तीर्थ है। इतिहास के गौरव को याद करते हुए हस्तिनापुर से लेकर चालुक्य काल तक जिनालयों के भव्य निर्माण की परंपरा को सामने रखा गया। जैन पहचान के प्रश्न को उठाते हुए कहा गया कि केवल नाम या जन्म ही जैन पहचान नहीं है, बल्कि त्याग, साधना और आचरण से ही वास्तविक जैन पहचान बनती है।

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि समाज की अरुचि और उपेक्षा के कारण अनेक मंदिर खंडहर में बदल गए या फिर उन पर कब्ज़ा हो गया। इसलिए संदेश दिया गया कि नगर मंदिर प्रत्येक जैन के जीवन का प्रथम और अंतिम तीर्थ है, जिसे सुरक्षित रखना हर जैन का दायित्व है। तीर्थ रक्षा के मुद्दों पर चर्चा करते हुए कहा गया कि प्राचीन तीर्थों पर उपेक्षा और कब्ज़े की समस्या गंभीर है। नए निर्माण की बजाय पुराने पवित्र स्थलों का संरक्षण किया जाना अधिक आवश्यक है। तीर्थों के आसपास जैन परिवारों का निवास भी ज़रूरी बताया गया ताकि वहां अव्यवस्था का खतरा न उत्पन्न हो।

संघ और समाज की मजबूती पर भी विशेष बल दिया गया। नंदी सूत्र और आचार्य भद्रबहु स्वामी का उदाहरण देकर बताया गया कि संघ की एकता ही समाज की सबसे बड़ी शक्ति है। समानांतर संस्थाओं की आलोचना करते हुए संगठन को मजबूत रखने और समय पर चुनाव कराकर संगठन में नई ऊर्जा भरने की आवश्यकता पर बल दिया गया। साधु-संतों की सुरक्षा को भी समाज का परम कर्तव्य बताया गया। पैदल विहार करने वाले साधुओं की रक्षा की दिशा में भारतीय जैन मिलन की पहल की सराहना की गई और इसे पूरे समाज के लिए अनुकरणीय बताया गया।

एकता और नेतृत्व का संदेश देते हुए कहा गया कि श्वेतांबर और दिगंबर सहित सभी जैन संप्रदायों को अपने विवाद छोड़कर एक मंच पर आना चाहिए। राजनीति और समाज दोनों में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया गया। हर श्रावक-श्राविका से यह संकल्प लेने का आह्वान किया गया कि वह समाज में फूट का कारण नहीं बनेगा, बल्कि एकता और भाईचारे को प्राथमिकता देगा।

राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश जैन ऋतुराज ने अपने मुख्य वक्तव्य में कहा कि जैन धर्म का इतिहास अनादि और अनंत है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम अपनी पहचान और एकता को मजबूत करें। तीर्थों और साधु-साध्वियों की रक्षा करना हर जैन का परम कर्तव्य है। गिरनार जी तीर्थ समेत सभी प्राचीन तीर्थों की सुरक्षा के लिए समाज को संगठित होकर संघर्ष करना होगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पुराने मंदिरों और तीर्थों की जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कराया जाए, बाउंड्रीवॉल का निर्माण कराया जाए और नियमित पूजा-अभिषेक तथा सेवा से इस विरासत को संरक्षित रखा जाए।

कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नरेश चंद जैन ने किया और अजय कुमार जैन महामंत्री ने सभी आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया। मीडिया कोऑर्डिनेटर और केंद्रीय महिला संयोजक मधु जैन ने बताया कि इसी अवसर पर कई सामाजिक और सेवा कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। इनमें श्री आदिनाथ धर्मार्थ चिकित्सालय में डॉ. अंशिका जैन (सीएमआई) की देखरेख में निशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर, जैन मिलन पारस द्वारा रक्तदान शिविर और जैन मित्र मंडल द्वारा जैन भवन मुख्य द्वार पर कड़ी-चावल वितरण कार्यक्रम शामिल थे।

इस तरह सम्मेलन ने न केवल तीर्थ संरक्षण का संदेश दिया, बल्कि समाज को एकजुट होकर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने का आह्वान भी किया।

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