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पहाड़ में फिर दहशत: चार साल की बच्ची को जिंदा उठा ले गया खूंखार गुलदार

कोटद्वार: पहाड़ की रातें वैसे ही जल्दी उतर आती हैं—सन्नाटा, ठंडी हवा और दूर-दूर तक फैली खामोशी। लेकिन उस रात चौबट्टाखाल क्षेत्र के तिमली ग्राम सभा के भतकोट गांव में जो सन्नाटा पसरा, वह सामान्य नहीं था; वह एक ऐसे दर्द से भरा हुआ था जिसे शब्दों में समेट पाना मुश्किल है। एक मासूम हंसी, जो कुछ ही देर पहले आंगन में गूंज रही थी, अचानक चीखों और मातम में बदल गई।

चार साल की नन्ही दृष्टि, जिसे अभी दुनिया को समझना भी ठीक से नहीं आया था, अपने घर के आंगन में खेल रही थी। पहाड़ों में आंगन ही बच्चों की दुनिया होता है—वहीं उनकी खिलखिलाहट, वहीं उनके सपने। लेकिन उसी आंगन में घात लगाकर बैठा खतरा किसी को दिखाई नहीं दिया। रात करीब नौ बजे, जब परिवार के लोग अपने-अपने कामों में लगे थे, तभी अचानक एक गुलदार ने झपट्टा मारा और मासूम को अपने जबड़ों में दबोच लिया।

यह सब इतना अचानक हुआ कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। मां-बाप की आंखों के सामने उनका कलेजा छिन गया। चीख-पुकार मची, लेकिन तब तक गुलदार बच्ची को आंगन से खींचकर अंधेरे खेतों की ओर ले जा चुका था। पहाड़ों की खामोशी उस वक्त टूट गई—हर घर से लोग बाहर निकल आए, टॉर्च लेकर, डंडे लेकर, उम्मीद और डर के बीच जूझते हुए।

ग्रामीणों ने रात के अंधेरे में हर झाड़ी, हर खेत को खंगालना शुरू किया। किसी को उम्मीद थी कि शायद बच्ची जिंदा मिल जाए, तो किसी के मन में अनहोनी का डर साफ झलक रहा था। पहाड़ की ये तलाश सिर्फ एक बच्ची की नहीं थी, बल्कि उस भरोसे की भी थी कि उनका घर, उनका आंगन सुरक्षित है। लेकिन कुछ ही दूरी पर झाड़ियों में जो मिला, उसने इस भरोसे को हमेशा के लिए तोड़ दिया।

दृष्टि का शव बेहद बुरी हालत में मिला। वह दृश्य इतना दर्दनाक था कि जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। मां-बाप के लिए तो यह पल जैसे पूरी जिंदगी पर भारी पड़ गया। उनका रो-रोकर बुरा हाल था, और गांव में हर व्यक्ति इस दुख को अपना समझकर सिसक रहा था।

पहाड़ों में इंसान और जंगली जानवरों के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है। जंगल सिमट रहे हैं, और जानवर अब गांवों की ओर आ रहे हैं। लेकिन हर ऐसी घटना के बाद सवाल वही खड़ा होता है—क्या पहाड़ के लोगों की जिंदगी इतनी सस्ती है? क्या उनके बच्चों का आंगन भी अब सुरक्षित नहीं रहा?

भतकोट गांव की यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं है, बल्कि पूरे पहाड़ की पीड़ा है। यहां हर मां अब अपने बच्चे को आंगन में अकेला छोड़ने से डर रही है। हर शाम अब पहले जैसी नहीं रही—उसमें एक अनकहा डर घुल चुका है।

रात के उस सन्नाटे में अब भी दृष्टि की हंसी जैसे गूंजती है, लेकिन उसके साथ जुड़ा दर्द हर दिल को चीर देता है। पहाड़ की जिंदगी वैसे ही कठिन होती है, लेकिन जब इस तरह के हादसे होते हैं, तो लगता है जैसे यहां जीना ही एक चुनौती बन गया है। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उस असहायता की कहानी है जिसमें पहाड़ का हर परिवार कहीं न कहीं खुद को देख रहा है।

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