ममता बनर्जी का बदलता राजनीतिक चेहरा: संघर्ष, सत्ता और सवालों का दौर

(सलीम रज़ा पत्रकार)
भारतीय राजनीति के विशाल परिदृश्य में पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से वैचारिक संघर्ष, जन आंदोलनों, सांस्कृतिक चेतना और तीखे राजनीतिक टकरावों के लिए जानी जाती रही है। इसी बंगाल की धरती से उभरकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाली ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन किसी साधारण नेता की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, महत्वाकांक्षा, जनसमर्थन, सत्ता, विवाद और अंततः राजनीतिक संकट की बहुस्तरीय गाथा है। एक समय ऐसा था जब बंगाल की राजनीति में उनका नाम ही सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति माना जाता था। वे गरीबों की आवाज, महिलाओं की आशा, किसानों की संरक्षक और वामपंथी शासन के विरुद्ध सबसे बड़ी प्रतिरोध शक्ति के रूप में देखी जाती थीं। किंतु लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के बाद जिस प्रकार उनकी राजनीति आलोचनाओं, भ्रष्टाचार के आरोपों, प्रशासनिक चुनौतियों और जन असंतोष के घेरे में आई, उसने उनके राजनीतिक सफर को अत्यंत पीड़ादायक और विरोधाभासी मोड़ पर ला खड़ा किया।
ममता बनर्जी का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था। उन्होंने छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। युवावस्था से ही उनमें संघर्षशीलता और राजनीतिक आक्रामकता स्पष्ट दिखाई देती थी। उस समय पश्चिम बंगाल में Communist Party of India (Marxist) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा राजनीतिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली था। वर्ष 1977 से लेकर लगातार तीन दशकों तक वाम मोर्चा बंगाल की सत्ता पर काबिज रहा। उस दौर में वामपंथी राजनीति इतनी मजबूत थी कि विपक्ष लगभग निष्प्रभावी दिखाई देता था। कांग्रेस संगठन कमजोर हो चुका था और आम जनता यह मानने लगी थी कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन संभव नहीं है।
ऐसे राजनीतिक वातावरण में ममता बनर्जी ने आक्रामक विरोध की राजनीति को अपना हथियार बनाया। वे सड़कों पर उतरती थीं, धरना देती थीं, पुलिस से भिड़ती थीं और हर छोटे-बड़े मुद्दे को जनता से जोड़ने का प्रयास करती थीं। उनकी शैली पारंपरिक राजनीति से अलग थी। वे बड़े मंचों की नेता नहीं बल्कि भीड़ के बीच जाकर संघर्ष करने वाली नेता के रूप में पहचानी जाने लगीं। यही कारण था कि धीरे-धीरे बंगाल के गरीब, निम्न मध्यम वर्ग, महिलाएं और ग्रामीण समुदाय उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ने लगे।
वर्ष 1997 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर All India Trinamool Congress की स्थापना की। उस समय बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे एक जोखिमपूर्ण निर्णय बताया था क्योंकि बंगाल में वामपंथ की जड़ें अत्यंत मजबूत थीं। किंतु ममता बनर्जी ने अपने संघर्ष को जारी रखा। वे रेलवे मंत्री भी बनीं और राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय रहीं, लेकिन उनका मुख्य लक्ष्य बंगाल की सत्ता पर कब्जा करना था।
उनके राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन बने। वर्ष 2006-07 के दौरान तत्कालीन वाम सरकार ने औद्योगीकरण के नाम पर किसानों की भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। सिंगूर में Tata Motors की नैनो परियोजना और नंदीग्राम में प्रस्तावित रासायनिक उद्योग केंद्र के खिलाफ बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन शुरू हुआ। ममता बनर्जी ने इस आंदोलन को केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे किसान सम्मान, ग्रामीण अधिकार और जनप्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। नंदीग्राम में हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई ने पूरे देश का ध्यान बंगाल की ओर खींचा। वाम मोर्चे की नैतिक छवि को इससे गहरा आघात पहुंचा और ममता बनर्जी बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षी शक्ति बनकर उभरीं।
वर्ष 2011 का विधानसभा चुनाव बंगाल के राजनीतिक इतिहास का निर्णायक क्षण साबित हुआ। लगभग 34 वर्षों तक सत्ता में रहने वाले वाम मोर्चे को पराजित कर टीएमसी ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। यह केवल सरकार परिवर्तन नहीं था बल्कि बंगाल की राजनीतिक मानसिकता में बड़े बदलाव का संकेत था। जनता ने ममता बनर्जी को परिवर्तन की प्रतीक के रूप में स्वीकार किया। उस समय यह धारणा बनी कि बंगाल में अब गरीबों और आम जनता की सरकार आई है।
सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कई लोककल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। कन्याश्री योजना के तहत बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया गया। इस योजना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली। रूपश्री योजना, स्वास्थ्य साथी योजना, छात्र क्रेडिट कार्ड योजना और महिलाओं के लिए विभिन्न सामाजिक सहायता कार्यक्रमों ने ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता को मजबूत किया। अल्पसंख्यक समुदायों के बीच भी उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा। वे स्वयं को “जनता की दीदी” के रूप में प्रस्तुत करती रहीं।
लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि लंबे समय तक सत्ता में बने रहना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक कठिन अपनी नैतिक विश्वसनीयता को बनाए रखना होता है। धीरे-धीरे टीएमसी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप सामने आने लगे। शुरुआत में इन आरोपों को विपक्षी प्रचार कहकर खारिज किया गया, किंतु समय बीतने के साथ स्थितियां बदलती गईं।
सबसे बड़ा झटका शिक्षक भर्ती घोटाले ने दिया। पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग से जुड़ी अनियमितताओं ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया। आरोप लगे कि शिक्षकों की नियुक्तियों में धन लेकर चयन किया गया। जांच एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान भारी मात्रा में नकदी और संपत्ति बरामद होने की खबरों ने जनता को चौंका दिया। इस मामले में टीएमसी के कई प्रभावशाली नेताओं और मंत्रियों के नाम सामने आए। विपक्ष ने इसे बंगाल के युवाओं के भविष्य के साथ धोखा बताया। बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं में असंतोष बढ़ने लगा।
इसके अतिरिक्त कोयला तस्करी, मवेशी तस्करी और स्थानीय निकायों में भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी सरकार की छवि को प्रभावित किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि उसने संगठनात्मक अनुशासन और नैतिक नियंत्रण को समय रहते मजबूत नहीं किया। पार्टी तेजी से विस्तारित हुई, लेकिन उसके साथ अवसरवादी राजनीति भी बढ़ी। कई ऐसे नेता पार्टी में शामिल हुए जिनका उद्देश्य केवल सत्ता और लाभ प्राप्त करना था। इससे जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतें बढ़ती चली गईं।
राजनीतिक हिंसा भी बंगाल की राजनीति का एक बड़ा संकट बनकर उभरी। पंचायत चुनावों, नगर निकाय चुनावों और विधानसभा चुनावों के दौरान हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आती रहीं। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया जा रहा है। कई स्थानों पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं। बंगाल लंबे समय से राजनीतिक संघर्षों का प्रदेश रहा है, लेकिन जनता को उम्मीद थी कि परिवर्तन के बाद राजनीतिक संस्कृति में बदलाव आएगा। जब ऐसा नहीं हुआ तो निराशा बढ़ने लगी।
आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। बंगाल कभी भारत का औद्योगिक केंद्र माना जाता था। कोलकाता व्यापार और उद्योग का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। लेकिन धीरे-धीरे उद्योगों का पलायन हुआ और राज्य आर्थिक चुनौतियों से घिरता गया। ममता बनर्जी सरकार ने निवेश आकर्षित करने के प्रयास किए, किंतु बड़े उद्योगों को लेकर सरकार की स्पष्ट नीति को लेकर हमेशा प्रश्न उठते रहे। उद्योगपतियों के बीच यह संदेश गया कि राज्य में राजनीतिक हस्तक्षेप अधिक है और प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल है।
बेरोजगारी का मुद्दा युवाओं के बीच सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरा। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद लाखों युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने लगे। सूचना प्रौद्योगिकी, विनिर्माण और निजी निवेश के क्षेत्र में बंगाल अपेक्षित गति प्राप्त नहीं कर सका। विपक्ष ने इसी मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया और यह धारणा बनाने का प्रयास किया कि बंगाल राजनीतिक नारों में आगे है लेकिन आर्थिक प्रगति में पीछे रह गया है।
इसी दौरान भाजपा ने बंगाल में तेजी से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करनी शुरू की। पहले जहां बंगाल में भाजपा लगभग नगण्य शक्ति थी, वहीं कुछ वर्षों में वह मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी। मोदी और भाजपा नेतृत्व ने बंगाल में राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और हिंदुत्व की राजनीति को मजबूत आधार देने का प्रयास किया। भाजपा ने टीएमसी पर तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार और हिंसा के आरोप लगाकर जनता के एक हिस्से को अपनी ओर आकर्षित किया।
विशेष रूप से वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन ने यह संकेत दे दिया था कि बंगाल की राजनीति तेजी से बदल रही है। हालांकि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने सत्ता बरकरार रखी, किंतु चुनावी संघर्ष अत्यंत तीखा था। नंदीग्राम सीट पर उनकी व्यक्तिगत हार ने राजनीतिक रूप से बड़ा प्रतीकात्मक संदेश दिया, भले ही बाद में वे दूसरी सीट से विधानसभा पहुंच गईं। यह घटना इस बात का संकेत थी कि उनकी राजनीतिक पकड़ अब पहले जैसी निर्विवाद नहीं रह गई है।
ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वे जिस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करते हुए सत्ता तक पहुंचीं, समय के साथ उनकी सरकार पर भी वैसी ही प्रवृत्तियों के आरोप लगने लगे। कभी वे वामपंथी शासन पर राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार और सत्ता के केंद्रीकरण का आरोप लगाती थीं, लेकिन बाद के वर्षों में विपक्ष ने वही आरोप टीएमसी पर लगाए। यह भारतीय राजनीति का एक बड़ा सत्य है कि आंदोलन से निकली हुई पार्टियां जब लंबे समय तक सत्ता में रहती हैं तो वे भी धीरे-धीरे उसी सत्ता संरचना का हिस्सा बन जाती हैं जिसके खिलाफ उन्होंने संघर्ष किया था।
इसके अतिरिक्त ममता बनर्जी की राजनीति अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित रही। पार्टी संगठन का अधिकांश ढांचा उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता पर निर्भर करता गया। इससे पार्टी में वैचारिक विकास और वैकल्पिक नेतृत्व का अभाव दिखाई देने लगा। जब किसी दल में संस्थागत लोकतंत्र कमजोर हो जाता है तो संकट के समय संगठन अस्थिर होने लगता है। टीएमसी के भीतर भी समय-समय पर असंतोष और गुटबाजी की खबरें सामने आती रहीं।
हालांकि यह भी सच है कि आज भी ममता बनर्जी बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। ग्रामीण महिलाओं, अल्पसंख्यकों और गरीब वर्ग के बीच उनका आधार अब भी मजबूत माना जाता है। उनकी राजनीतिक ऊर्जा, जनसंपर्क क्षमता और संघर्षशील छवि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। लेकिन जनता के बीच यह भावना अवश्य बढ़ी है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण सरकार में थकान, प्रशासनिक शिथिलता और राजनीतिक अहंकार के तत्व बढ़ गए हैं।
बंगाल का राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि यहां की जनता लंबे समय तक किसी भी सत्ता को बिना चुनौती दिए स्वीकार नहीं करती। जिस जनता ने कभी वाम मोर्चे को अपराजेय माना था, उसी जनता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया। आज टीएमसी भी उसी ऐतिहासिक चक्र का सामना करती दिखाई दे रही है। यदि पार्टी समय रहते संगठनात्मक सुधार, पारदर्शिता, रोजगार सृजन, उद्योग विकास और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीरता से काम नहीं करती, तो भविष्य में उसके सामने और बड़ी राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर इसलिए भी अत्यंत मार्मिक माना जाएगा क्योंकि यह केवल एक नेता के उत्थान और संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उस त्रासदी की कहानी भी है जिसमें जनता की उम्मीदों का प्रतीक बना नेतृत्व धीरे-धीरे सत्ता के बोझ, राजनीतिक विवादों और प्रशासनिक विफलताओं के दबाव में अपनी नैतिक चमक खोने लगता है। संघर्ष से निकली राजनीति जब सत्ता के स्थायी ढांचे में बदल जाती है, तब उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है कि क्या वह अपनी मूल आत्मा को बचा पाएगी। बंगाल की राजनीति में आज यही प्रश्न सबसे अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।