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आगामी विधानसभा चुनाव में क्या होगा उत्तराखण्ड क्रांति दल का सियासी रोल?

( सलीम रज़ा, पत्रकार, लेखक )

उत्तराखण्ड की राजनीति का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, तब उत्तराखण्ड क्रांति दल (यूकेडी) का नाम सबसे पहले आने वाले संगठनों में शामिल रहेगा। अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग को मजबूत आवाज देने में इस क्षेत्रीय दल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समय के साथ राजनीति बदली, नए दल मजबूत हुए और चुनावी समीकरण भी बदलते गए, लेकिन उत्तराखण्ड क्रांति दल आज भी राज्य आंदोलन की पहचान के रूप में देखा जाता है। हालांकि यह भी सच है कि जिस राजनीतिक ताकत के साथ इस दल ने कभी उत्तराखण्ड की राजनीति को प्रभावित किया था, वह स्थिति अब नहीं रही है।

उत्तराखण्ड क्रांति दल के कई नेताओं ने अलग-अलग समय पर संगठन को आगे बढ़ाने का काम किया। उन्हीं नेताओं में दिवाकर भट्ट का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने लंबे समय तक पार्टी संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने और राज्य के मूल मुद्दों को जनता के बीच उठाने का प्रयास किया। दिवाकर भट्ट हमेशा इस बात पर जोर देते रहे कि उत्तराखण्ड की राजनीति का केंद्र राज्य के गांव, पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, जंगल और जमीन जैसे मुद्दे होने चाहिए। उनका मानना रहा कि यदि उत्तराखण्ड के संसाधनों का सही उपयोग किया जाए तो राज्य के युवाओं को रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

दिवाकर भट्ट का राजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने ऐसे समय में भी पार्टी का झंडा उठाए रखा, जब उत्तराखण्ड क्रांति दल लगातार कमजोर होता जा रहा था। कई वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने, संगठन में टूट और चुनावी हार के बावजूद उन्होंने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने का प्रयास किया। उन्होंने विभिन्न जन आंदोलनों में भाग लेकर यह संदेश देने की कोशिश की कि यूकेडी केवल चुनाव लड़ने वाली पार्टी नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला संगठन भी है।

हालांकि उत्तराखण्ड क्रांति दल की सबसे बड़ी चुनौती यही रही कि वह राज्य बनने के बाद अपने आंदोलन को मजबूत राजनीतिक ताकत में नहीं बदल सकी। जिस जनसमर्थन के आधार पर राज्य आंदोलन चला, वह धीरे-धीरे राष्ट्रीय दलों की ओर खिसकता गया। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने राज्य की राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, जबकि यूकेडी लगातार संगठनात्मक कमजोरियों, नेतृत्व विवाद और गुटबाजी से जूझती रही।

बीते दो दशकों में पार्टी कई बार टूट का शिकार हुई। अलग-अलग नेताओं ने अपने-अपने गुट बनाए, जिससे कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हुई। इसका सीधा असर चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ा। कई बार ऐसा हुआ कि जिन सीटों पर कभी यूकेडी का मजबूत प्रभाव माना जाता था, वहां पार्टी उम्मीदवार सम्मानजनक प्रदर्शन भी नहीं कर पाए। इससे संगठन का मनोबल कमजोर हुआ और नए कार्यकर्ताओं का जुड़ाव भी अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ पाया।

इसके बावजूद उत्तराखण्ड क्रांति दल पूरी तरह राजनीति से बाहर नहीं हुआ है। राज्य के कई हिस्सों में आज भी ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि उत्तराखण्ड के मूल मुद्दों को सबसे पहले और सबसे मजबूती से यूकेडी ने ही उठाया था। जब भी पलायन, गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने, भू-कानून, मूल निवास, स्थानीय युवाओं को रोजगार या पर्वतीय क्षेत्रों के विकास जैसे विषय सामने आते हैं, तब यूकेडी की आवाज भी सुनाई देती है।

मौजूदा समय में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की है। इसके लिए केवल आंदोलन करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि संगठन को गांव-गांव तक मजबूत करना होगा। युवाओं, महिलाओं और नए नेतृत्व को आगे लाने के साथ-साथ पार्टी को आधुनिक राजनीतिक सोच अपनानी होगी। यदि संगठन अपने अंदर की गुटबाजी समाप्त कर एकजुट होकर जनता के बीच जाता है, तो वह फिर से अपनी पहचान मजबूत कर सकता है।

उत्तराखण्ड की राजनीति में इस समय कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर क्षेत्रीय दल अपनी भूमिका निभा सकते हैं। भू-कानून, मूल निवास, बेरोजगारी, पलायन, पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, सड़क, पेयजल और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे विषय जनता के बीच लगातार चर्चा में हैं। यदि यूकेडी इन मुद्दों पर लगातार जनसंपर्क अभियान चलाकर लोगों का विश्वास जीतने में सफल होती है, तो उसका जनाधार बढ़ सकता है।

आगामी विधानसभा चुनाव की बात करें तो राज्य की मुख्य लड़ाई अभी भी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच दिखाई देती है। दोनों राष्ट्रीय दलों का संगठन मजबूत है और उनके पास संसाधनों की भी कमी नहीं है। ऐसे में उत्तराखण्ड क्रांति दल के लिए सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं माना जा सकता। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि पार्टी की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो गई है।

यदि यूकेडी सीमित सीटों पर मजबूत और लोकप्रिय उम्मीदवार उतारती है, स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता के बीच ले जाती है और संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखती है, तो वह कुछ क्षेत्रों में मुकाबले को रोचक बना सकती है। कई विधानसभा क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखती है। ऐसी स्थिति में पार्टी भले अधिक सीटें न जीते, लेकिन वह बड़े दलों के वोटों को प्रभावित कर सकती है और त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति पैदा कर सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दलों की ताकत केवल सीटों की संख्या से नहीं आंकी जाती। कई बार छोटे दल ऐसे मुद्दे उठाते हैं, जिन्हें बाद में बड़ी पार्टियों को भी अपने घोषणा पत्र में शामिल करना पड़ता है। उत्तराखण्ड क्रांति दल भी वर्षों से यही भूमिका निभाता आया है। राज्य से जुड़े कई विषय पहले यूकेडी ने उठाए और बाद में वे मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बने।

दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं का योगदान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने लगातार यह कोशिश की कि उत्तराखण्ड की राजनीति राज्य की मूल भावना से जुड़ी रहे। उनका जोर हमेशा इस बात पर रहा कि विकास का लाभ पहाड़ के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और राज्य निर्माण के समय जिन सपनों को लेकर आंदोलन हुआ था, उन्हें भुलाया न जाए।

आने वाले विधानसभा चुनाव में उत्तराखण्ड क्रांति दल की सफलता काफी हद तक उसकी संगठनात्मक मजबूती, नेतृत्व की एकजुटता और जनता के बीच उसकी सक्रियता पर निर्भर करेगी। यदि पार्टी अपने पुराने कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने, युवाओं को जोड़ने और जनता के भरोसे को दोबारा हासिल करने में सफल रहती है, तो वह उत्तराखण्ड की राजनीति में फिर से एक प्रभावी क्षेत्रीय विकल्प के रूप में उभर सकती है। लेकिन यदि आंतरिक मतभेद और संगठनात्मक कमजोरियां बनी रहती हैं, तो उसके लिए चुनावी सफलता की राह कठिन ही रहेगी।

उत्तराखण्ड की राजनीति में उत्तराखण्ड क्रांति दल का महत्व केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह दल राज्य आंदोलन की विरासत, क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय मुद्दों की राजनीति का प्रतीक रहा है। यही कारण है कि आज भी जब उत्तराखण्ड के भविष्य, उसकी पहचान और उसके विकास मॉडल की चर्चा होती है, तब उत्तराखण्ड क्रांति दल और दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं के योगदान को याद किया जाता है। आने वाला चुनाव इस बात की भी परीक्षा होगा कि क्या यह ऐतिहासिक क्षेत्रीय दल एक बार फिर जनता के बीच अपनी पुरानी पहचान और राजनीतिक प्रासंगिकता को स्थापित कर पाता है या नहीं।

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